निर्जला एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित प्रमुख एकादशी है। इसे ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी के रूप में मनाया जाता है और ‘निर्जल’ शब्द का अर्थ होता है बिना जल के। इस दिन व्रती भोजन के साथ-साथ पानी भी पूरी तरह से त्याग देते हैं, इसलिए इसे सबसे कठिन और पवित्र व्रत माना जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार निरजला एकादशी के विधान से पूरे वर्ष की चौबीसों एकादशियों का पुण्यफल प्राप्त होता है। धर्मग्रंथों में इसे पापनाशिनी एकादशी कहा गया है – ऐसा माना जाता है कि इस व्रत से सभी पाप धुल जाते हैं और भक्त की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।
वैष्णव परंपरा में इसे ‘भीमसेन एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि कथानुसार पांडव भीम से इसका सम्बंध जुड़ा है। भक्तजन मानते हैं कि निरजला व्रत विधिपूर्वक करने से आयु लंबी होती है, कल्याण होता है और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।
निर्जला एकादशी 2025 ऐतिहासिक संदर्भ
निर्जला एकादशी की परंपरा सनातन धर्म में प्राचीन काल से चली आ रही है। महाभारतकाल में ही महर्षि वेदव्यास ने पांडवों को यह व्रत बताया था, इसलिए इसे महाभारत-पुराण कालीन माना जाता है। ग्रंथों में इसके महत्व का वर्णन विस्तार से मिलता है। वैष्णव परंपरा में इसे अत्यंत पवित्र और श्रेष्ठ व्रत माना जाता है। वर्तमान में भी भारत सहित विश्वभर में हिन्दू समुदाय इसे श्रद्धापूर्वक मनाता है।
निर्जला एकादशी वैज्ञानिक पहलू
यह व्रत शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण होता है क्योंकि गर्मियों में निर्जल उपवास से निर्जलीकरण, सिरदर्द, थकावट, चक्कर आना जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। इसलिए इस व्रत को करने से पहले और बाद में विशेष सावधानी बरतना आवश्यक होता है। उपवास से पहले पर्याप्त पानी पीना और व्रत खोलते समय हल्का भोजन लेना आवश्यक है।
अचानक अधिक जल या भारी भोजन लेने से पाचन में समस्या हो सकती है। हालांकि धार्मिक दृष्टि से यह व्रत पुण्यदायी है, परंतु शरीर की स्थिति को ध्यान में रखते हुए इसे करना चाहिए।
निर्जला एकादशी कब है?
2025 में निर्जला एकादशी 06 जून (शुक्रवार) से प्रारंभ होकर अगले दिन सुबह तक रहेगी। हरि वासर (द्वादशी तिथि में) समापन के बाद ही व्रत का पारण करना चाहिए: स्मार्त संप्रदाय के व्रती 7 जून दोपहर और वैष्णव संप्रदाय के व्रती 8 जून सुबह निर्धारित मुहूर्त में पारण करेंगे। पंचांग अनुसार इस दिन भद्रावास योग (रात्रि 3:31 से 4:47) और सुबह वरीयान योग (10:14 बजे से) जैसे शुभ योग बन रहे हैं।
निर्जला एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त
यहाँ दी गई तालिका में निर्जला एकादशी 2025 की तिथि और शुभ मुहूर्त की संक्षिप्त जानकारी प्रस्तुत है।
| विवरण | तिथि | समय |
|---|---|---|
| एकादशी तिथि प्रारंभ | 06 जून 2025 (शुक्रवार) | रात 02:15 बजे |
| एकादशी तिथि समाप्त | 07 जून 2025 (शनिवार) | सुबह 04:47 बजे |
| स्मार्त व्रत पारण | 07 जून 2025 (शनिवार) | दोपहर 01:44 से 04:31 बजे |
| वैष्णव व्रत पारण | 08 जून 2025 (रविवार) | सुबह 05:23 से 07:17 बजे |
निर्जला एकादशी का पौराणिक और धार्मिक महत्व
- यह व्रत भीमसेनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि महाभारत के भीमसेन ने यह व्रत रखा था।
- पौराणिक मान्यता के अनुसार, निर्जला एकादशी का पालन करने से सभी एकादशियों का पुण्य प्राप्त होता है।
- यह व्रत पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति में सहायक होता है।
- भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।
विष्णु पुराण, पद्म पुराण और स्कंद पुराण में इस व्रत का विस्तार से वर्णन मिलता है।
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व्रत की विधि – निर्जला एकादशी व्रत कैसे करें?
निर्जला एकादशी व्रत करने की पूरी विधि और जरूरी नियम यहाँ सरल भाषा में जानें।
व्रत का प्रारंभ
- प्रातः काल स्नान कर के भगवान विष्णु की मूर्ति अथवा चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित करें।
- पीले पुष्प, तुलसी दल, फल और पंचामृत से भगवान की पूजा करें।
- ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जाप करें।
उपवास नियम
- इस दिन अन्न, फल, जल कुछ भी ग्रहण नहीं किया जाता।
- यह व्रत पूर्ण निर्जल उपवास के रूप में किया जाता है।
- केवल अस्वस्थ या वृद्ध व्यक्ति फलाहार कर सकते हैं (वैकल्पिक रूप)।
दान-पुण्य करें
- जलपात्र, अन्न, वस्त्र, छाता, घड़ा, और गोरस का दान करें।
- तुलसी का पौधा, गाय को हरा चारा आदि देना अति पुण्यकारी माना गया है।
निर्जला एकादशी व्रत के नियम
निर्जला एकादशी व्रत के सफल पालन के लिए जरूरी नियम और सावधानियाँ निम्नलिखित हैं।
- इस व्रत में अन्न, जल और फलाहार तक वर्जित होता है।
- केवल शारीरिक रूप से असक्षम व्यक्ति फल या पानी ग्रहण कर सकते हैं।
- व्रत के दौरान क्रोध, झूठ, बुरे विचार और हिंसा से बचना चाहिए।
- तुलसी पत्र भगवान विष्णु को जरूर अर्पित करें।
- इस दिन दान-पुण्य करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है।
निर्जला एकादशी 2025 का व्रत भक्ति, संयम और आत्मनियंत्रण का प्रतीक है। यह व्रत भक्तों को आध्यात्मिक शुद्धता, पुण्य और मोक्ष की ओर अग्रसर करता है। यदि आप भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस एकादशी का व्रत अवश्य करें।
शास्त्रों में निर्जला एकादशी को अनिवार्य क्यों कहा गया है?
शास्त्रों ने “निर्जला एकादशी” को अनिवार्य नहीं, बल्कि वैकल्पिक रूप से श्रेष्ठ बताया है — विशेषतः उन लोगों के लिए जो अन्य 23 एकादशियाँ नहीं रख पाते।
कारण
- उपवास का सार संयम है, और अगर कोई पूरे वर्ष की एकादशियाँ नहीं रख सका, तो एक बार का कठिन तप (निर्जला व्रत) पूरे वर्ष की पूर्ति कर सकता है — इसे भीमसेन को दिए गए उपदेश से समझा जा सकता है।
- यह व्रत आत्मसंयम, तप, श्रद्धा और श्रद्धालु मन की परीक्षा का प्रतीक है।
- जल और अन्न का त्याग करके व्यक्ति अपने अहंकार, लालच, इंद्रियों की लोलुपता और इच्छा पर विजय पाता है — यही सनातन धर्म में व्रत का उद्देश्य है।
- निर्जला एकादशी को रखने से “समस्त पापों से मुक्ति” और “मोक्ष” की प्राप्ति कही गई है, इसलिए यह व्रत “सर्वश्रेष्ठ फलदायी” माना गया है।
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हरि ॐ – जय श्री विष्णु
FAQs
एकादशी तिथि पर स्नान कर भगवान विष्णु की पूजा करें और दिनभर अन्न-जल का त्याग करें।
नहीं, यह व्रत पूरी तरह निर्जल होता है। केवल अशक्त या बीमार व्यक्ति फलाहार कर सकते हैं।
यह व्रत 24 एकादशियों के बराबर पुण्य देता है और मोक्ष की प्राप्ति कराता है।
द्वादशी तिथि पर सूर्योदय के बाद पारण करें। ब्राह्मण को भोजन कराकर व्रत समाप्त करें।



